शामली। उत्तर प्रदेश में जहां आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दल मैदान में सक्रिय नजर आ रहे हैं, वहीं जनपद शामली में कांग्रेस पार्टी की हालत को लेकर सियासी गलियारों में तीखी चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कभी जिले की राजनीति में मजबूत दखल रखने वाली कांग्रेस आज कई इलाकों में लगभग नाममात्र की पार्टी बनती दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जिन नेताओं ने कभी जिले में कांग्रेस की मजबूत नींव रखी थी, उनके बाद पार्टी नेतृत्व का ऐसा खालीपन पैदा हुआ जिसे भरने वाला कोई बड़ा चेहरा सामने नहीं आ पाया। परिणाम यह हुआ कि संगठन धीरे-धीरे कमजोर होता चला गया और कार्यकर्ताओं का उत्साह भी ठंडा पड़ता गया।
एक दौर में पूर्व विधायक बशीर अहमद, वरिष्ठ नेता अब्दुल हफीज, पूर्व सांसद चौधरी अख्तर हसन, पूर्व राज्य मंत्री रियासत राणा और पूर्व शामली विधानसभा प्रत्याशी चौधरी अय्यूब जंग जैसे नेता कांग्रेस की पहचान माने जाते थे। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन नेताओं ने गांव-गांव तक पार्टी का नेटवर्क खड़ा किया था। लेकिन इन नेताओं के निधन के बाद कांग्रेस की सियासत मानो सहारे के बिना रह गई।
कस्बा कैराना, जो कभी कांग्रेस की राजनीति का बड़ा केंद्र माना जाता था, वहां भी अब पार्टी की गतिविधियां बेहद सीमित बताई जा रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार कार्यक्रम भी सिर्फ औपचारिकता तक ही सीमित रह जाते हैं। वहीं कुछ कार्यकर्ताओं का आरोप है कि संगठन के अंदर ही आपसी खींचतान और छोटे नेताओं की राजनीति ने पार्टी को और कमजोर कर दिया है।
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि जहां अन्य दल लगातार अपने संगठन को मजबूत करने में लगे हैं, वहीं कांग्रेस जिले में कोई ठोस रणनीति बनाती नजर नहीं आ रही। यही कारण है कि कई पुराने समर्थक भी अब दूसरे राजनीतिक विकल्पों की ओर झुकते दिखाई दे रहे हैं।
ऐसे में सवाल उठने लगा है कि क्या शामली में कांग्रेस की सियासत सचमुच सिमटती जा रही है, या फिर पार्टी चुनाव से पहले कोई बड़ा दांव खेलकर अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश करेगी। फिलहाल जिले की राजनीति में यही चर्चा सबसे ज्यादा सुनाई दे रही है।
रिपोर्ट -गुलवेज़ आलम कैराना
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